प्रथम भाव (तनु भाव)
प्रथम भाव (तनु भाव) वैदिक कुंडली का 1वाँ भाव है। इसकी नैसर्गिक राशि मेष है, स्वामी मंगल, एवं कारक सूर्य। यह स्वयं, शरीर, ओज का स्वामी है। यहाँ प्रथम भाव का अर्थ, बलवान या पीड़ित प्रथम भाव के फल, एवं इसे पढ़ने की विधि दी गई है।
मुख्य तथ्य
| नैसर्गिक राशि | मेष |
| नैसर्गिक स्वामी | मंगल |
| कारक | सूर्य |
| भाव प्रकार | केंद्र + त्रिकोण (लग्न) |
| अंग (कालपुरुष) | सिर |
किसका स्वामी है
- स्वयं, व्यक्तित्व एवं स्वभाव
- शरीर, रूप एवं स्वास्थ्य
- ओज, आत्मविश्वास एवं जीवन-दिशा
- संपूर्ण कुंडली का समग्र बल
जब यह बलवान हो
बलवान प्रथम भाव एवं लग्नेश उत्तम स्वास्थ्य, आत्मविश्वास, प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं इच्छित दिशा में चलने वाला जीवन देते हैं।
जब यह पीड़ित हो
पीड़ित प्रथम भाव क्षीण ओज, स्वास्थ्य समस्याएँ, आत्म-सम्मान की कमी या भटका हुआ जीवन दे सकता है, जब तक लग्नेश को बल न मिले।
इस भाव में ग्रह
इस भाव में कौन-से ग्रह बैठे हैं एवं इसके स्वामी का बल — यही वास्तविक फल तय करते हैं। सामान्यतः नैसर्गिक शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, वृद्धिमान चंद्र) भाव को बल देते हैं, जबकि पाप ग्रह (शनि, मंगल, राहु, केतु, सूर्य) उसे दबाव देते हैं — केवल उपचय भावों (3, 6, 10, 11) को छोड़कर, जहाँ पाप ग्रह प्रायः उत्तम फल देते हैं।
इसे कैसे पढ़ें
अपनी कुंडली में प्रथम भाव पढ़ने हेतु तीन बातें देखें: भाव पर स्थित राशि, उस राशि का स्वामी ग्रह (एवं वह कहाँ स्थित है), तथा भाव में स्थित कोई भी ग्रह। प्रत्येक भाव हेतु तीनों देखने के लिए निःशुल्क कुंडली बनाएँ।