चतुर्थ भाव (सुख भाव)
चतुर्थ भाव (सुख भाव) वैदिक कुंडली का 4वाँ भाव है। इसकी नैसर्गिक राशि कर्क है, स्वामी चंद्र, एवं कारक चंद्र। यह माता, घर, आंतरिक शांति का स्वामी है। यहाँ चतुर्थ भाव का अर्थ, बलवान या पीड़ित चतुर्थ भाव के फल, एवं इसे पढ़ने की विधि दी गई है।
मुख्य तथ्य
| नैसर्गिक राशि | कर्क |
| नैसर्गिक स्वामी | चंद्र |
| कारक | चंद्र |
| भाव प्रकार | केंद्र |
| अंग (कालपुरुष) | वक्ष, हृदय |
किसका स्वामी है
- माता एवं मातृ-सुख
- घर, भूमि, संपत्ति एवं वाहन
- आंतरिक शांति, सुख एवं भावनाएँ
- शिक्षा, मूल एवं मातृभूमि
जब यह बलवान हो
बलवान चतुर्थ भाव सुख, संपत्ति एवं वाहन, स्नेही माता, आंतरिक संतोष एवं सुखी गृह-जीवन देता है।
जब यह पीड़ित हो
पीड़ित चतुर्थ भाव घरेलू अशांति, संपत्ति-समस्याएँ, माता से कठिनाई, या बेचैन, असंतुष्ट मन दे सकता है।
इस भाव में ग्रह
इस भाव में कौन-से ग्रह बैठे हैं एवं इसके स्वामी का बल — यही वास्तविक फल तय करते हैं। सामान्यतः नैसर्गिक शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, वृद्धिमान चंद्र) भाव को बल देते हैं, जबकि पाप ग्रह (शनि, मंगल, राहु, केतु, सूर्य) उसे दबाव देते हैं — केवल उपचय भावों (3, 6, 10, 11) को छोड़कर, जहाँ पाप ग्रह प्रायः उत्तम फल देते हैं।
इसे कैसे पढ़ें
अपनी कुंडली में चतुर्थ भाव पढ़ने हेतु तीन बातें देखें: भाव पर स्थित राशि, उस राशि का स्वामी ग्रह (एवं वह कहाँ स्थित है), तथा भाव में स्थित कोई भी ग्रह। प्रत्येक भाव हेतु तीनों देखने के लिए निःशुल्क कुंडली बनाएँ।