द्वितीय भाव (धन भाव)

द्वितीय भाव (धन भाव) वैदिक कुंडली का 2वाँ भाव है। इसकी नैसर्गिक राशि वृषभ है, स्वामी शुक्र, एवं कारक गुरु। यह धन, परिवार, वाणी का स्वामी है। यहाँ द्वितीय भाव का अर्थ, बलवान या पीड़ित द्वितीय भाव के फल, एवं इसे पढ़ने की विधि दी गई है।

मुख्य तथ्य

नैसर्गिक राशिवृषभ
नैसर्गिक स्वामीशुक्र
कारकगुरु
भाव प्रकारमारक / पणफर
अंग (कालपुरुष)चेहरा, गर्दन, मुख

किसका स्वामी है

  • धन, बचत एवं संचित संपत्ति
  • परिवार, प्रारंभिक पालन एवं संस्कार
  • वाणी, स्वर एवं भाषा
  • भोजन, तथा चेहरा, मुख एवं नेत्र

जब यह बलवान हो

बलवान द्वितीय भाव स्थिर धन, सहयोगी परिवार, मधुर एवं प्रभावी वाणी, तथा बचत एवं धन-संग्रह की क्षमता देता है।

जब यह पीड़ित हो

पीड़ित द्वितीय भाव आर्थिक अस्थिरता, पारिवारिक कलह, कठोर या दोषपूर्ण वाणी, एवं बचत बनाए रखने में कठिनाई दे सकता है।

इस भाव में ग्रह

इस भाव में कौन-से ग्रह बैठे हैं एवं इसके स्वामी का बल — यही वास्तविक फल तय करते हैं। सामान्यतः नैसर्गिक शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, वृद्धिमान चंद्र) भाव को बल देते हैं, जबकि पाप ग्रह (शनि, मंगल, राहु, केतु, सूर्य) उसे दबाव देते हैं — केवल उपचय भावों (3, 6, 10, 11) को छोड़कर, जहाँ पाप ग्रह प्रायः उत्तम फल देते हैं।

इसे कैसे पढ़ें

अपनी कुंडली में द्वितीय भाव पढ़ने हेतु तीन बातें देखें: भाव पर स्थित राशि, उस राशि का स्वामी ग्रह (एवं वह कहाँ स्थित है), तथा भाव में स्थित कोई भी ग्रह। प्रत्येक भाव हेतु तीनों देखने के लिए निःशुल्क कुंडली बनाएँ।