सप्तम भाव (कलत्र भाव)

सप्तम भाव (कलत्र भाव) वैदिक कुंडली का 7वाँ भाव है। इसकी नैसर्गिक राशि तुला है, स्वामी शुक्र, एवं कारक शुक्र। यह विवाह, व्यापारिक साझेदारी, संबंध का स्वामी है। यहाँ सप्तम भाव का अर्थ, बलवान या पीड़ित सप्तम भाव के फल, एवं इसे पढ़ने की विधि दी गई है।

मुख्य तथ्य

नैसर्गिक राशितुला
नैसर्गिक स्वामीशुक्र
कारकशुक्र
भाव प्रकारकेंद्र / मारक
अंग (कालपुरुष)श्रोणि, निचला पेट

किसका स्वामी है

  • विवाह एवं जीवनसाथी
  • व्यापारिक साझेदारी एवं अनुबंध
  • संबंध एवं जनता
  • व्यापार, लेन-देन एवं विदेश यात्रा

जब यह बलवान हो

बलवान सप्तम भाव सुखी विवाह, सहयोगी जीवनसाथी, सफल साझेदारी एवं उत्तम जन-व्यापार व्यवहार देता है।

जब यह पीड़ित हो

पीड़ित सप्तम भाव वैवाहिक कलह, विवाह में विलंब, समस्याग्रस्त साझेदारी या व्यापार में हानि दे सकता है।

इस भाव में ग्रह

इस भाव में कौन-से ग्रह बैठे हैं एवं इसके स्वामी का बल — यही वास्तविक फल तय करते हैं। सामान्यतः नैसर्गिक शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, वृद्धिमान चंद्र) भाव को बल देते हैं, जबकि पाप ग्रह (शनि, मंगल, राहु, केतु, सूर्य) उसे दबाव देते हैं — केवल उपचय भावों (3, 6, 10, 11) को छोड़कर, जहाँ पाप ग्रह प्रायः उत्तम फल देते हैं।

इसे कैसे पढ़ें

अपनी कुंडली में सप्तम भाव पढ़ने हेतु तीन बातें देखें: भाव पर स्थित राशि, उस राशि का स्वामी ग्रह (एवं वह कहाँ स्थित है), तथा भाव में स्थित कोई भी ग्रह। प्रत्येक भाव हेतु तीनों देखने के लिए निःशुल्क कुंडली बनाएँ।