षष्ठ भाव (रिपु भाव)
षष्ठ भाव (रिपु भाव) वैदिक कुंडली का 6वाँ भाव है। इसकी नैसर्गिक राशि कन्या है, स्वामी बुध, एवं कारक मंगल एवं शनि। यह शत्रु, ऋण, रोग का स्वामी है। यहाँ षष्ठ भाव का अर्थ, बलवान या पीड़ित षष्ठ भाव के फल, एवं इसे पढ़ने की विधि दी गई है।
मुख्य तथ्य
| नैसर्गिक राशि | कन्या |
| नैसर्गिक स्वामी | बुध |
| कारक | मंगल एवं शनि |
| भाव प्रकार | दुःस्थान + उपचय |
| अंग (कालपुरुष) | आंतें, पाचन |
किसका स्वामी है
- शत्रु, प्रतिद्वंद्वी एवं प्रतिस्पर्धा
- ऋण, कर्ज़ एवं मुकदमा
- रोग, स्वास्थ्य एवं दैनिक कार्य
- सेवा, कर्मचारी एवं बाधाएँ
जब यह बलवान हो
उपचय होने से बलवान षष्ठ भाव वस्तुतः शत्रुओं पर विजय, प्रतिस्पर्धा एवं मुकदमे में जीत, ऋण-मुक्ति एवं रोग पर विजय में सहायक होता है।
जब यह पीड़ित हो
पीड़ित षष्ठ भाव दीर्घकालिक रोग, बढ़ता ऋण, प्रबल शत्रु या निरंतर विवाद दे सकता है।
इस भाव में ग्रह
इस भाव में कौन-से ग्रह बैठे हैं एवं इसके स्वामी का बल — यही वास्तविक फल तय करते हैं। सामान्यतः नैसर्गिक शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र, बुध, वृद्धिमान चंद्र) भाव को बल देते हैं, जबकि पाप ग्रह (शनि, मंगल, राहु, केतु, सूर्य) उसे दबाव देते हैं — केवल उपचय भावों (3, 6, 10, 11) को छोड़कर, जहाँ पाप ग्रह प्रायः उत्तम फल देते हैं।
इसे कैसे पढ़ें
अपनी कुंडली में षष्ठ भाव पढ़ने हेतु तीन बातें देखें: भाव पर स्थित राशि, उस राशि का स्वामी ग्रह (एवं वह कहाँ स्थित है), तथा भाव में स्थित कोई भी ग्रह। प्रत्येक भाव हेतु तीनों देखने के लिए निःशुल्क कुंडली बनाएँ।