केतु ग्रह (Ketu)
केतु, चंद्रमा का दक्षिण बिंदु, दूसरा छाया ग्रह है — वैराग्य, अध्यात्म, मोक्ष, अंतर्ज्ञान, पूर्व-जन्म कर्म एवं अहं के आकस्मिक क्षय का कारक। राहु के विपरीत यह समेटता एवं परिष्कृत करता है; मोटे तौर पर मंगल जैसा आचरण करता है।
मुख्य तथ्य
| संस्कृत नाम | Ketu |
| कारक | वैराग्य, अध्यात्म, पूर्व कर्म, मोक्ष |
| स्वभाव | पाप (छाया) |
| तत्व | अग्नि |
| लिंग | — |
| स्वराशि | वृश्चिक का सह-स्वामी (कुछ मत) |
| उच्च | वृश्चिक / धनु (मतभेद) |
| नीच | वृषभ / मिथुन (मतभेद) |
| मूलत्रिकोण | — |
| मित्र | मंगल, शुक्र, शनि |
| शत्रु | सूर्य, चंद्र |
| दिग्बल | — |
| दिन | मंगलवार |
| रत्न | लहसुनिया |
| देवता | गणेश |
| दशा अवधि | 7 वर्ष |
जब यह बलवान / शुभ स्थित हो
- आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि एवं वैराग्य
- तीव्र अंतर्ज्ञान एवं उपचार-क्षमता
- गूढ़ विद्या, अनुसंधान एवं मोक्ष-मार्ग में सफलता
- अहं एवं भौतिकता से मुक्ति
जब यह निर्बल या पीड़ित हो
- भ्रम, संशय एवं आकस्मिक हानि
- दिशाहीनता या जीवन से विरक्ति का भाव
- रहस्यमय रोग, एलर्जी या संक्रमण
- व्यक्ति या सुख से वियोग
करियर एवं जीवन क्षेत्र
केतु अध्यात्म, उपचार एवं चिकित्सा, अनुसंधान, गूढ़ विद्या एवं ज्योतिष, आईटी एवं तकनीकी क्षेत्रों तथा पर्दे के पीछे या खोजी कार्यों को अनुकूल बनाता है।
स्वामी नक्षत्र
विंशोत्तरी दशा पद्धति में केतु 27 नक्षत्रों में से तीन का स्वामी है: अश्विनी, मघा, मूल। इन नक्षत्रों में स्थित ग्रह एवं चंद्रमा केतु का स्वभाव धारण करते हैं एवं इसकी दशा आरंभ करते हैं।
उपाय
- गणेश पूजन करें; केतु मंत्र पढ़ें
- बहुरंगी वस्तुएँ एवं तिल दान करें
- कुत्ता पालें; साधुओं एवं साधकों की सेवा करें
- कुंडली पुष्टि के बाद ही लहसुनिया धारण करें