वैदिक ज्योतिष में भाव
वैदिक कुंडली बारह भावों में बँटी होती है, प्रत्येक जीवन के किसी विशेष क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है — स्वयं एवं धन से लेकर विवाह, करियर एवं मोक्ष तक। प्रथम भाव आपके लग्न से आरंभ होता है — जन्म के समय उदित राशि — और भाव फिर राशिचक्र में वामावर्त चलते हैं।
जहाँ राशि गुण है एवं ग्रह कर्ता, वहाँ भाव वह क्षेत्र है जहाँ कर्म प्रकट होता है। किसी विषय को पढ़ने हेतु — जैसे विवाह — आप उसका भाव (सप्तम), उसका स्वामी ग्रह, उसमें स्थित ग्रह, एवं उसका नैसर्गिक कारक (शुक्र) देखते हैं। यही कुंडली विश्लेषण का मूल है।
एक दृष्टि में 12 भाव
भावों का वर्गीकरण
भावों को उनके फल के अनुसार समूहित किया जाता है:
- केंद्र: 1, 4, 7, 10 — कुंडली के स्तंभ; बलवान, कर्म-प्रधान, विष्णु के भाव।
- त्रिकोण: 1, 5, 9 — सर्वाधिक शुभ भाव — धर्म, भाग्य एवं कृपा के।
- दुःस्थान: 6, 8, 12 — संघर्ष, बाधा, हानि एवं परिवर्तन के भाव।
- उपचय: 3, 6, 10, 11 — समय एवं परिश्रम से सुधरने वाले भाव; यहाँ पाप ग्रह भी शुभ फल देते हैं।
- मारक (2, 7) — आयु-विचार में प्रयुक्त 'मारक' भाव।
भाव, राशियाँ एवं स्वामी
प्रत्येक भाव की एक नैसर्गिक राशि एवं स्वामी होता है (प्रथम = मेष/मंगल, द्वितीय = वृषभ/शुक्र, इत्यादि राशिचक्र के क्रम में), पर आपकी कुंडली में प्रत्येक भाव पर वास्तविक राशि आपके लग्न पर निर्भर करती है। भाव के स्वामी का बल एवं उसमें स्थित ग्रह उस जीवन-क्षेत्र का फल तय करते हैं। अपने प्रत्येक भाव की राशि एवं ग्रह देखने हेतु निःशुल्क कुंडली बनाएँ।